Thursday, February 29
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नारी शक्ति का प्रतीक है नवरात्र का पर्व, स्त्रियां ने अपने कर्म से जलाए रखा उम्मीद का दीया

पौराणिक कथा के अनुसार जब महिषासुर स्वर्ग और पृथ्वी में उत्पात मचाने लगा और उसे नियंत्रित करने के देवताओं के प्रयास विफल होने लगे तो (नारी) शक्ति यानि मां दुर्गा का सृजन किया गया। मां दुर्गा ने नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। इस वर्ष शुरुआती नौ महीने कोरोना संक्रमण से संघर्ष में बीते हैं और साल का दसवां महीना दुर्गापूजा का है। यह आस्था का महापर्व और उम्मीद का महीना है। हम उम्मीद करते हैं कि इस महापर्व के बाद कोविड-19 का संहार होगा। हमारी उम्मीद का आधार हैं देश की ऐसी नारीशक्ति जो शुरुआत से ही कोरोना संक्रमण के खिलाफ संघर्षरत हैं। जिन्होंने अपने कर्म से उम्मीद का दीया लगातार जलाए रखा है।

खुद उठाई जिम्मेदारी

 जब लंबे समय से चले आ रहे लॉकडाउन और लगातार सामने आ रही नकारात्मक खबरों ने अपनों की सलामती को लेकर मन में उलझनें बढ़ाईं तो महिलाएं चैन से कैसे बैठतीं! कुछ ऐसा ही हुआ चेन्नई के कन्नई नगर में रहने वाली महालक्ष्मी, हेमलता, ओसाना और वलार के साथ। जब घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं, तब करें तो क्या करें? ऐसे में उन्होंने पुलिस से इजाजत लेकर अपनी गली को कोरोनामुक्त करने का प्रयास किया। महालक्ष्मी कहती हैं, ‘जब हमें पता चला कि हमारे इलाके में एक व्यक्ति को कोरोना संक्रमण हो गया है तो वाकई हमारी नींद उड़ गई थी। घर में तो नीम, हल्दी व संक्रमणरोधी उत्पादों की मदद से सफाई चल रही थी, पर जरूरी सामान लाने के लिए गली में निकले बिना कैसे काम चले। तब हमने पुलिस से इजाजत ली और पानी में नीम के पीसे पत्ते, हल्दी पाउडर और संक्रमणरोधी उत्पाद डालकर मिश्रण तैयार किया और खुद झाड़ू लेकर गली की सफाई कर डाली।’

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जिम्मेदारी और ममता के बीच संतुलन

 गोरखपुर की सिपाही असिया बेगम जब लॉकडाउन के दौरान ड्यूटी के लिए निकलती थीं तो पीछे मुड़कर नहीं देखती थीं पर उनके अपनों की आंखें जरूर नम हो जाती थीं। दरअसल उनके दो बच्चे हैं। छह साल का रिशु और एक साल की बेटी फ्रूटी। बड़ा बेटा तो फिर भी समझदारी दिखाने लगा था, पर छोटी बेटी मां के लिए मचल जाती थी। वह मां के दूध के लिए रोती तो थी, पर मां असिया उस वक्त उसे गोद तक में नहीं ले पाती थीं। ड्यूटी के कारण कई जगहों पर जाना होता था, लिहाजा एहतियातन बच्चों से दूरी बनाकर रखती थीं। बच्ची मां के लिए बिलख-बिलख कर रोती, मगर मां ने खाकी वर्दी की जिम्मेदारी को प्राथमिकता में रखा।

उनका कहना था कि बच्ची को परिवार के दूसरे लोग भी संभाल लेंगे, पर अभी मेरी जरूरत देहरी के बाहर है। कुछ ऐसा ही हाल था सिपाही रीना उपाध्याय का। तीन साल की बेटी और एक साल का बेटा। बच्चे जब भी मां को देखते तो गोद में आने के लिए मचल जाते। रीना बताती हैं कि उनके लिए इस उम्र के बच्चों को खुद से दूर रखना बहुत मुश्किल रहा, पर लॉकडाउन के दौरान बिलखते बच्चों से मुंह मोड़ना पड़ता था। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की कपकोट की सीओ ने अप्रैल में होने वाली अपनी शादी यह कहकर टाल दी कि अभी उनकी जिम्मेदारी समाज के प्रति है। शादी तो बाद में भी हो जाएगी।

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भूखा न सोए कोई

 लॉकडाउन की वजह से जब पटना की झुग्गी-झोपड़ियों में भोजन पर आफत की खबरें सामने आने लगीं तो पटना की अमृता सिंह और पल्लवी सिन्हा ने स्लम एरिया में खाना और राशन सामग्री पहुंचानी शुरू की, ताकि एक भी पेट भूखा न रहे। आयुष विभाग (रांची) में मेडिकल ऑफिसर डॉ. वर्तिका की दो बेटियां हैं। दूसरी बच्ची का जन्म तो इसी वर्ष 23 अप्रैल को हुआ। गर्भावस्था के आखिरी महीने तक उन्होंने सेवा दी। डॉ. वर्तिका का कहना था कि परिस्थिति ही ऐसी थी कि अपने दर्द से बड़ा अपना फर्ज नजर आता था। इसी तरह आइएएस श्रीजना गुममाला की तस्वीर सुर्खियों में आई जब वे 22 दिन के बेटे के साथ ऑफिस में तैनात दिखीं। राज्य के मुख्यमंत्री से बात करने के बाद श्रीजना छह महीने के मातृत्व अवकाश पर गईं और विशाखापट्टनम के नगर निगम आयुक्त की जिम्मेदारी संभाल ली।

देवी के साक्षात स्वरूप को नमन

 कोरोना संक्रमण का यह दौर बेशक कष्टकारी है, पर यह भी सच है कि यह हमें जिंदगी के कई पाठ पढ़ा रहा है। हमने स्वच्छता, आत्मनिर्भरता, अनुशासन और किफायत की अहमियत समझी। हमने जाना कि उत्सव मनाने के लिए बड़े-बड़े रेस्त्रं की नहीं, अपनों के साथ की दरकार होती है। हम अपने घर-परिवार की नारीशक्ति से सही मायने में रूबरू हुए जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान सीमित संसाधन में भी घर की खुशियों में कोई कमी नहीं आने दी। इस दौरान जन्मदिन,विवाह,वर्षगांठ या त्योहार के जितने भी उत्सव हुए, यकीनन परिवार के बीच अधिक यादगार रहे। पता ही नहीं था कि नुक्कड़ की मिठाई, समोसे और जलेबी से अच्छे व्यंजन तो गृहणी की रसोई में तैयार हो जाते हैं। वहीं कर्मस्थल पर भी उनके लिए बनी पूर्वधारणा से इतर एक अलग तस्वीर नजर आई।रांची के हटिया रेलवे स्टेशन पर जब महिला एएसआई ने लॉकडाउन में घर लौटते एक प्रवासी श्रमिक के बच्चे को दूध के लिए बिलखते देखा तो तुरंत स्कूटी उठाई और अपने बच्चे के लिए घर में रखा दूध बोतल में भरकर ले आईं। क्या देवी के नौ रूपों की तरह यह मां का दसवां रूप नहीं है! जीती-जागती मां, जो किसी को रोता नहीं देख सकती, कहीं कष्ट बर्दाश्त नहीं कर पाती, जो हमेशा अपना आंचल आंसू पोछने के लिए बढ़ाती है, जो सुख देने के लिए तत्पर रहती है। मां दुर्गा का यह साक्षात रूप लॉकडाउन के दौरान वास्तविक जीवन में दिखा और खूब दिखा। दरकार है इस रूप की पहचान करने की, उनका सम्मान करने की और कोशिश करने की कि यह सिलसिला थमे नहीं।

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