Friday, February 23
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राजाओं का रक्त कुंड है दुर्गा कुंड: यहां मां दुर्गा ने किया था विश्राम

शिव नगरी काशी में शक्ति भी अपने सम्पूर्ण तेज प्रताप के साथ विराजमान है। अनादिकाल में इस नगरी में सिर्फ तीन ही मंदिर हुआ करते थे। बाबा विश्वनाथ, माता अन्नपूर्णा और मां दुर्गा। मां दुर्गा का मंदिर वस्तुतः शक्तिपीठ है। ये वो जगह है जहां मां ललिताम्बा त्रिपुरसुन्दरी ने शुम्भ निशुम्भ नाम के दो राक्षसों का वध करने के बाद विश्राम किया था। ये वो स्थान है जहां मां भगवती अपने भक्त की पुकार पर प्रकट होती हैं। ये वो जमीन है जहां मां भवानी ने अपने भक्त के विरोधी राजाओं का वध कर डाला। इस युध्द में इतना रक्तपात हुआ कि वहां रक्तकुंड बन गया। यह वही रक्तकुंड है जिसे आज हम दुर्गाकुंड के नाम से जानते हैं। काशी में दुर्गाकुंड स्थित मां दुर्गा के मंदिर से जुड़े रहस्यों को जानने से पहले हमें जगदम्बे अम्बे को साष्टांग दंडवत कर उनकी स्तुति करनी चाहिए। इसके लिए हमें मां की कथा का श्रवण करना चाहिए। मां शरशूल धारिणी सनातन धर्म की आदिशक्ति हैं। मां चित्तरूपा शाक्त मत की आराध्य देवी हैं। मां पिनाकधारिणी की तुलना परब्रह्म से की जाती है। वो आदिशक्ति, प्रधान प्रकृति, गुणवती योगमाया, बुद्धि तत्व की जननी और विकार रहित हैं। वो महातपा सत्यानंद स्वरूपीणी हैं। वो अंधकार और अज्ञान रूपी राक्षसों से रक्षा करने वाली हैं। जगत कल्याणकारी हैं। शान्ति, समृद्धि और धर्म पर आघात करने वाली आसुरी शक्तियों का विनाश करतीं हैं।

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काशी का यह स्थान अभी हाल तक बहुत ही निर्जन हुआ करता था। चारों तरफ जंगल थे। उस समय यह मंदिर बंदरों का डेरा हुआ करता था। शारदीय नवरात्र की चतुर्थी तिथि को मां कुष्मांडा के रूप में मां दुर्गा के दर्शन का विधान है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस मंदिर में मां दुर्गा का कोई विग्रह है ही नहीं। इसकी वजह है कि यहां मां चामुंडा स्वयं प्रकट हुई थीं। शुम्भ और निशुम्भ के वध के बाद उन्होंने इस स्थान पर विश्राम किया था। कहते हैं कि जिस स्थान पर भगवती स्वयं प्रकट हों वहां उनका विग्रह स्थापित नहीं किया जाता। यहां भी ऐसा ही है। यहां विग्रह के स्थान पर श्रीशक्ति यंत्र स्थापित है। उसी पर मां शाम्भवी का मुखौटा लगा हुआ है। माता की चरण पादुका भी रखी है। इस यंत्र का श्रृंगार कर मुखौटे और चरण पादुका की अर्चना की जाती है। कम लोग जानते हैं कि इस मंदिर की स्थापना बीसा यंत्र पर की गयी है। बीसा यंत्र का मतलब बीस कोणीय ऐसा यंत्र जो शक्तिदाता है। जिससे पूरे माहौल में एक अलग तरह की सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। यही वजह है कि इस पूरे क्षेत्र में एक वाइब्रेशन है। कम्पन है। स्पंदन है। दुर्गाकुंड के दुर्गा मंदिर की नींव भी इसी बीसा यंत्र पर रखी गयी है। अब माता के विग्रह के स्थान पर रखे गये श्रीशक्ति यंत्र के बारे में भी समझिए। इस यंत्र का तेज इतना प्रबल है कि कहते हैं कि मां दुर्गा के इस रूप का उनके ठीक सामने खड़े होकर दर्शन करने से जन्म जन्मातंर के पाप नष्ट हो जाते हैं।

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लाल पत्थर के बने नागर शैली के इस मंदिर का जो वर्तमान स्वरूप आप देखते हैं उसका इतिहास महज दो सौ साठ साल पुराना है। लेकिन अनादिकाल में इस मंदिर की स्थापना काशी नरेश सुबाहू ने की थी। महाराज सुबाहू की एक बेटी थी। उसका नाम जया था। वो मां दुर्गा की भक्त थी। राजा सुबाहू ने इसीलिए उसका नाम मां भगवती पर जया रखा था। जब वो विवाह योग्य हुई तो काशीराज ने उसके स्वयंवर के लिए देशभर के राजे महाराजों को आमंत्रित किया। स्वयंवर की ऐन पहली रात जया ने स्वप्न में देखा कि उसका विवाह अयोध्या के राजकुमार सुदर्शन से हो रहा है। उसने सुबह यह बात अपने पिता को बतायी। महाराज सुबाहू ने स्वयंवर सभा में आये सभी राजाओं को इस बात की जानकारी दी। इस पर देशभर के राजाओं ने अपनी तलवारें खींच ली और राजकुमार सुदर्शन को युध्द की चुनौती दे दी। नौजवान सुदर्शन प्रयाग में भारद्वाज ऋषि के आश्रम से अपनी शिक्षा दीक्षा पूरी कर अभी निकला ही था। सामने देश के तमाम शक्तिशाली राजाओं की भारी भीड़ देख कर वो थोड़ा घबरा गया। लेकिन वो भी जया की तरह मां आदिशक्ति का उपासक था। उसने मां चामुंडा की स्तुति कर उनका वरदहस्त मांगा। कहते हैं कि राजकुमार के आर्तनाद को सुन माता भवानी वहां प्रकट हो गयीं। उन्होंने सुदर्शन को विजयी होने का वरदान दिया। यह वही स्थान है जहां आज श्रीशक्ति यंत्र के रूप में मां ललिताम्बा स्थापित हैं। राजाओं ने जैसे ही राजकुमार सुदर्शन को युध्द के लिए ललकारा मां भवानी ने उसे अपने पीछे कर एक एक राजाओं का वध कर डाला। कहते हैं कि इस युध्द में इतना खून बहा था कि वहां एक रक्तकुंड बन गया। आज जिस जगह हम दुर्गाकुंड देखते हैं वह वस्तुतः वही रक्तकुंड है। राजकुमार सुदर्शन और राजकुमारी जया ने मां त्रिपुरसुन्दरी से आशिर्वाद मांगा और उनसे विनती की कि हे माते, आप दया कर इस रक्तकुंड को जलाशय के रूप में परिवर्तित कर दें। मां के तथास्तु कहते ही राजाओं के खून से बना रक्तकुंड जलाशय के रूप में बदल गया। कहते हैं कि यहां का पानी इसीलिए कभी सूखता नहीं। यह माता भवानी की अखंड कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मां ने महाराज सुबाहू को आदेश दिया कि वो जया का विवाह सुदर्शन से तत्काल कर दें। मां शाम्भवी ने कहा कि जो भी व्यक्ति सच्चे दिल से मुझे यहां आकर पुकारेगा मैं तत्काल प्रकट होकर उसे दर्शन दूंगी और उसके सारे मनोरथ पूर्ण करूंगी। यही वजह है कि मां दुर्गा का प्रताप अनवरत रूप से आज भी जारी है।

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मंदिर से जुड़ी एक और रहस्यमय कथा है। एक बार लुटेरों के एक गिरोह ने यहां मनौती मानी की अगर आज अच्छी कमायी हुई तो वह मां दुर्गा को नरबलि अर्पित करेंगे। लूट में अच्छी खासी रकम मिलने पर गिरोह ऐसे शख्स की तलाश में जुट गया जो हर तरह से बेदाग हो। जो बलि के योग्य हो। निष्पाप हो। निष्काम हो। बहुत ढूंढ़ने पर भी उन्हें कोई मिला नहीं। अचानक उन्हें मंदिर के पुजारी दिखे। उन लोगों को वो बलि के लिए हर तरह से उपयुक्त लगे। लुटेरों ने यह बात पुजारी को बतायी। उन्होंने कहा कि मुझे पता है कि मेरे न मानने पर तुम लोग ऐसे भी मुझे मार दोगे। मैं बलि के लिए तैयार हूं। बस मुझे आखिरी बार मां दुर्गा की पूजा कर लेने दो। उधर पूजा खत्म हुई और लुटेरों ने पुजारी की बलि चढ़ा दी। बलि के पूर्ण होते ही मां दुर्गा वहां प्रकट हो गयीं। उन्होंने पुजारी को फिर से जीवित कर दिया और वर मांगने को कहा। पुजारी ने कहा हे मां, मुझे अपने श्री चरणों में स्थान दे दीजिए। मां ने एवमस्तु कहा। मां भगवती ने यह भी कहा कि आज के बाद से मेरे दर्शन के उपरांत यदि किसी ने तुम्हारा दर्शन नहीं किया गया तो उसे मेरे दर्शन का फल प्राप्त नहीं होगा। इसके थोड़ी ही देर बाद पुजारी ने देह त्याग दिया। उन्हें मंदिर परिसर में ही समाधि दी गयी। इस समाधि को ही कुक्कुटेश्वर महादेव कहते हैं। मां दुर्गा के दर्शन के उपरांत कुक्कुटेश्वर महादेव के दर्शन की परम्परा आज भी कायम है।

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मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण सन् 1760 में बंगाल की रानी भवानी ने कराया था। आज से दो सौ साठ साल पहले इसके लिए उन्होंने पचास हजार रूपए से ज्यादा की रकम खर्च की थी। मंदिर में चारों ओर का बरामदा पेशवा बाजीराव द्वितीय का बनवाया हुआ है। कुंड को पक्का बनवाने का काम इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने किया। मंदिर में लगे दोनों विशाल घंटे नेपाल नरेश ने भेंट में चढ़ाये थे। मंदिर परिसर में चंड भैरव के अलावा मां भद्रकाली, महालक्ष्मी, महा सरस्वती, शिव, हनुमान और राधाकृष्ण की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। गणपति का विग्रह भी यहां स्थापित है। दुर्गा मंदिर में हर शुक्रवार को भारी भीड़ होती है। श्रावण मास में पूरे एक महीने तक यहां विशेष मेला लगता है। दुर्गा जी का मंदिर दर्शनार्थियों के लिए सुबह चार बजे से बारह बजे तक और दोपहर में एक बजे से रात दस बजे तक खुला रहता है। सुबह की आरती पांच बजे और शयन आरती रात नौ बजे होती है। काशी के कैंट रेलवे स्टेशन से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित श्री दुर्गा मंदिर तक किसी भी वाहन से आया जा सकता है।

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