Thursday, June 20
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आखिर क्यों महागठबंधन की हुई हार, जाने क्या रहा सबसे बड़ा कारण

बिहार विधान सभा चुनाव के नतीजों (Bihar Election Result 2020) ने महागठबंधन की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. सवाल उठता है कि कांग्रेस क्या वाकई तेजस्वी के लिए बोझ बन गई.
आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दलों के महागठबंधन में सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे. आखिर कुल 243 सीटों में से 70 सीटें महागठबंधन के सबसे कमजोर घटक दल को क्यों दी गईं? 2020 के चुनाव में महागठबंधन को हार का सामना करना पड़ा, तो इसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है.

नेतृत्व का अभाव?


बिहार में एनडीए (NDA) या मोदी (Modi) को हराने को लिए हुए महागठबंधन (Mahagathbandhan) को हार मिलने का सबसे बड़ा कारण नेतृत्व का अभाव रहा. मोदी के मुकाबले महागठबंधन के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं था. महागठबंधन में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी मजबूती का संदेश नहीं दे पाई. राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पूरे चुनाव के दौरान मोदी के मुकाबले कहीं ठहरते नजर नहीं आए. महागठबंधन मोदी को हराने का संदेश देने की कोशिश करता रहा लेकिन पूरे चुनाव में मोदी के मुकाबले लड़ने में सक्षम नेतृत्व का संदेश देने के अभाव से जूझता रहा.

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कांग्रेस को 70 सीटें क्यों?


बिहार में इस बार कांग्रेस (Congress) 70 सीटों पर चुनाव लड़ी. इतनी सीटों पर लड़ने के बाद भले ही कांग्रेस राज्य विधान सभा चुनाव के प्रमुख राजनीतिक दलों में शुमार हो गई लेकिन परिणाम से कांग्रेस बीमार ही दिखी. आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दलों के महागठबंधन सीट शेयरिंग फॉर्मूले पर शुरुआत से ही सवाल उठते रहे. आखिर कुल 243 सीटों में से 70 सीटें महागठबंधन के सबसे कमजोर घटक दल को क्यों दी गईं?

मोदी के प्रति भरोसा और बढ़ा


दूसरा सबसे बड़ा कारण जनता का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के प्रति भरोसा रहा. भले ही भाजपा लगातार कहती रही कि बिहार चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है लेकिन जनता ने जेडीयू से अधिक सीटें भाजपा को दीं. माना जा रहा है कि मतदाता ने भाजपा की घोषणाओं और वादों पर भरोसा किया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मोदी ने ज्यादातर अपने वादे पूरे किए जिनमें जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटाना हो या फिर सीएए. राजनीतिक जानकारों का मानना है मोदी बिहार में लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे जबकि महागठबंधन के प्रति लोगों के मन में विश्वास नहीं जाग पाया.

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नौकरी नहीं रोजगार


बिहार चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के तेजस्वी यादव ने सरकार आने पर 10 लाख नौकरी का वादा किया था. तेजस्वी की घोषणा पर पलटवार करते हुए भाजपा ने नौकरी नहीं रोजगार देने की बात कही. भाजपा के बड़े नेता लगातार अपने भाषणों में स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने की बात कहते रहे इसके बावजूद महागठबंधन इसकी काट नहीं कर पाया. तेजस्वी या कांग्रेस बिहार के स्थानीय व्यापार को लेकर कोई बड़ी उम्मीद जगाने में असफल रहे. कांटे की टक्कर के लिए याद किया जाएगा चुनाव
भले ही एनडीए की जीत हुई लेकिन ये चुनाव सभी पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर भी याद दिलाता रहेगा. जनता ने एनडीए (NDA) को पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने का जनादेश दिया है लेकिन मंगलवार सुबह से शुरू हुई वोटों की गिनती ने देर रात तक उम्मीदवारों की उलझनें बनाए रखीं. कई सीटों पर तो नतीजों के आने के बाद भी हारने वालों को यकीन नहीं है.


इन सीटों पर रही कड़ी टक्कर


इस चुनाव में कई सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर बेहद कम है और इन सीटों में हारने वाले उम्मीदवार लगभग सभी दलों के हैं और सबसे करीबी मुकाबला हिल्सा सीट पर हुआ जहां बीजेपी के रामचंद्र प्रसाद ने आरजेडी के भोला यादव को सिर्फ 12 वोटों से हराया. इसके आलावा कई सीटों पर जीत का अंतर 500 से भी कम रहा जिनमें बरबीघा सीट से जेडीयू के सुदर्शन कुमार ने कांग्रेस के गजानंद शाही को 113 वोट से हराया. रामगढ़ सीट से आरजेडी के सुधाकर सिंह ने बीएसपी के अंबिका सिंह को 198 वोट से हराया. मटिहानी सीट से एलजेपी के राज कुमार सिंह ने जेडीयू के नागेंद्र सिंह को 333 वोट से हराया. भोरे सीट से जेडीयू के सुनील कुमार ने सीपीआई (एमएल) के जितेंद्र पासवान को 462 वोट से हराया. डेहरी सीट से आरजेडी के फतेबहादुर सिंह ने बीजेपी के सत्यनारायण सिंह को 464 वोट से हराया.


2015 में ऐसा था सीटों का गणित


आपको बता दें कि 2015 के चुनाव में भाजपा ने 157 सीटों पर ताल ठोकी थी और 53 पर जीत दर्ज की थी. जदयू ने 101 सीटों पर दांव खेला था और उसे 71 सीटें मिली थीं. लोजपा ने 2015 में 42 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन वह सिर्फ दो सीटें ही जीत सकी. राजद ने 101 सीटों पर ताल ठोकी और 80 सीटें जीत हासिल की थीं. कांग्रेस ने 41 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 27 सीटें अपनी झोली में डाली थीं. वामपंथी दलों ने 48 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाए थे.

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